Friday, 27 September 2019

नवरात्रि शुभ मुहूर्त,कलश स्थापना 2019


   नवरात्रि शुभ मुहूर्त




                👉29 सितंबर 2019👈 से  शरदीय नवरात्र आरंभ हो जाएगे और हिंदू धर्म में नवरात्र का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माता कैलाश पर्वत से धरती पर अपने मायके आती है मां का धरती पर आगमन कई कारणों से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नवरात्रि माता ने जिस वाहन पर सवार होकर आती है उसे देश और दुनिया के लिए आने वाला एक साल कैसा रहेगा इस बात का भी पता चल जाता है।
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                         नवरात्रों में माता के भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके अलग-अलग नौ रूपों की पूजा करने के साथ ही उपवास भी रखते हैं। और नवरात्रि के पहले दिन घर में कलश स्थापना की जाती है।

कलश स्थापना :-

कलश स्थापना करने के लिए कुछ विशेष नियम और शुभ मुहूर्त होता है जिसमें पूजा करने से माताणी जल्दी से प्रसन्न हो जाती है। मां दुर्गा की कृपा पाने के लिए कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:16 से लेकर सुबह 7:40 तक रहना है। जो कि 29 सितंबर को है। इसके अलावा जो भक्त सुबह कलश स्थापना नहीं कर पा रहे हैं। उनके लिए दिन में 11:48 से लेकर 12:35 मिनट तक का समय कलश स्थापना के लिए शुभ रहने वाला है। कलश स्थापना का सही तरीका जानना है तो नवरात्रि के पहले दिन जो घट स्थापना की जाती है ।उसे ही कलश स्थापना कहा जाता है। कलश स्थापना करने के लिए नदी की रेत का उपयोग करना चाहिए इस रेत में  जौं डालने के बाद गंगाजल,लोंग, इलाइची, पान,सुपारी, रोली, कलावा, चंदन,अक्सद, हल्दी या पुष्प आदि डाले। इसके बाद (ओम भूमेह नम:) कहते हुए कलश को सात अनाज के साथ रेत के ऊपर स्थापित कर दे। कलश की जगह पर  नौं दिन तक अखंड दीपक जलाना चाहिए । 

माँ का पर्व है आता , हज़ारों खुशियां है लाता ,  इस बार माँ आपको वो सब दे अापको, जो आपका दिल है चाहता. शुभ नवरात्रि 🙏🙏
कलश स्थापना करने के नियमों को अनदेखा नहीं करना चाहिए क्योंकि कलश की स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। कभी भी कलश का मुंह खुला ना रखें अगर आप कलश को किसी ढक्कन से ढक रहे हैं तो उस ढक्कन को भी चावलों से भर दे। इसके बाद बीचों बीच एक नारियल रखे और पूजा करने के बाद मां को दोनों समय लोम और बतासे का भोग लगाएं।माता रानी को लाल सिंदूर और लाल पुष्प दोनों ही ज्यादा प्रिय है। तो आपको जरूर याद रखना चाहिए कि लाल वस्त्र, लाल फूल, लाल सिंदूर अर्पित करना चाहिए।


और इसके बाद 7 अक्टूबर को दोपहर 12:38 बजे तक नवमी मनाई जाएगी और इसके बाद दशमी अगले दिन 8 अक्टूबर दोपहर 2:01 तक मनाई जाएगी

श्री दुर्गा नवरात्र व्रत

विधि : इस व्रत में उपवास या फलाहा . . इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई नियम नहीं । प्रात : काल उठकर स्नान करके , मन्दिर में परपरही नवरात्रों में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा पढनी चाहिए । कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष फलदाय जगदम्बा की कृपा से सब विघ्न दूर होते हैं । कथा के अन्त बारम्बार " दुर्गा माता तेरी सदा जय हो " का उच्चारण करें । कथा : बहस्पति जी बोले - हे ब्रह्मा जी ! आप अत्यन्त मान . सर्वशास्त्र और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ । हे प्रभु ! कृपा कर मेरा वचन सुनो । चैत्र , आश्विन , माघ और आषाढ मास के शुक्लपक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है ? हे भगवान् ! इस व्रत का फल क्या है ? किस प्रकार करना उचित है ? और पहले इस व्रत को किसने किया ? सो विस्तार से कहो । बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे बृहस्पते ! प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया । जो मनुष्य मनोरथपूर्ण करने वाली दुर्गा , महादेवी , सूर्य और नारायण का ध्यान करते , वे मनुष्य धन्य हैं । यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है । इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र , धन चाहने वाले को धन , विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख मिल सकता है । इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार में पड़ा हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है । मनुष्य की तमाम विपत्तियाँ दूर हो जाती हआर उसके घर में सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ आकर उपस्थित हो जाती प्रत आर त्याहार हैं । बन्ध्या और काक बन्ध्या के इस व्रत के करने से पुत्र हो जाता है । समस्त पापों को दूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन - सा मनोरथ है जो सिद्ध नहीं हो सकता । जो मनुष्य इस अलभ्य मनुष्य देह को पाकर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता है वह माता - पिता से हीन हो जाता है अर्थात् उसके माता - पिता मर जाते हैं और वह अनेक दुःखों को भोगता है । उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंगहीन हो जाता है , उसके सन्तानोत्पत्ति नही होती है । इस प्रकार वह मर्ख अनेक दुःख भोगता है । इस व्रत को न करने वाला निर्दयी मनुष्य धन और धान्य से रहित हो , भूख और प्यास के मारे पृथ्वी पर घूमता है और गूंगा हो जाता है । जो सुहागिन स्त्री भूल से इस व्रत को नहीं करती है वह पति से हीन होकर नाना प्रकार के दुःखों को भोगती है । यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और उस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा श्रवण करे । हे बृहस्पते । जिसने पहले इस महाव्रत को त किया है उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूँ । तुम सावधान होकर सुनो । इस प्रकार ब्रह्मा जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले - हे ब्राह्मण ! मनुष्यों का कल्याण करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो , मैं सावधान होकर सुन रहा हूँ । आपकी शरण आए हुए मुझ पर कृपा करो । ब्रह्मा जी बोले पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्मण रहता था । वह भगवती दुर्गा का भक्त था । उसके सम्पूर्ण सदगणों से यक्त मानों ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो ऐसी यथार्थ नाम वाली सुमति नाम की एक अत्यन्त सन्दर का कन्या सुमति अपने घर के बालक - अपने घर के बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती चन्द्रमा की कलाब और होम किया कर उपस्थित होती थी । खेलने लग गई और करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में कला बढ़ती है । उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा की पूजा किया करता था । उस समय वह भी नियम से वहाँ होती थी । एक दिन वह सुमति अपनी सखियों के साथ जग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई । पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया जी से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री ! आज प्रभात से तुमने विती का पूजन नहीं किया , इस कारण मैं किसी कुष्ठी और मनष्य के साथ तेरा विवाह करूँगा । इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुःख हुआ और पिता से कहने लगी कि हे पिता जी ! मैं आपकी कन्या हूँ । मैं आपके सब तरह से आधीन हूँ , जैसी आप की इच्छा हो वैसा ही करो । रोगी , कष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी तुम्हारी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हो । होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है , मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है । मनुष्य न जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है पर होता वही है जो भाग्य में विधाता ने लिखा है । जो जैसा करता है उसको फल भी उस कर्म के अनुसार ही मिलता है , क्योंकि कर्म करना मनुष्य के आधीन है । पर फल देव के आधीन है । जेसे अग्नि में पड़े हुए तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को अधिक क्रोध आया । तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ - जाओ जल्दी जाओ । अपने कर्म का फल भोगो । देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकरक्या करती है ? इस प्रकार से कहे हए पिता के कटु वचनों को समय सुमति अपने मन में विचार करने लगी कि - अहो ! मेरा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला । इस तरह अपने दर का विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयानक वन में कुशायुक्त उस स्थान पर उन्होंने का रात बड़े कष्ट से व्यतीत की । उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगी कि हे दीन ब्राह्मणी ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ , तुम जी चाहो वरदान माँग सकती हो । मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूँ । इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी कि आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुई हो , यह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीनदासी को कृतार्थ करो । ऐसा ब्राह्मणी का वचन सुनकर देवी कहने लगी कि मैं आदि शक्ति हूँ और मैं ही ब्रह्मा , विद्या और सरस्वती हूँ । मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुःख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूँ । हे ब्राह्मणी ! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूँ । तुम्हारे पूर्व जन्म का वृत्तान्त सुनाती हूँ सुनो ! तू पूर्व जन्म में निषाद ( भील ) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी । एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की । चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया । उन लोगों ने तेरे को और तेरे पति को भोजन भी नहीं किया । इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कछ खाया और न जल ही पिया । इसलिए नौ दिन तक नवरात्रगया । प्रसन्न होकर तुम्हें मनोज दोसो माँगो । इस प्रकार बोली कि अगर आप प्रणाम करती हैं । का देवी कहने लगी कि के एक दिन का पा समान उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के तिम्हें मनोवांछित वस्तु दे रही हूँ तुम्हारी जो इच्छा इस प्रकार दुर्गा के कहे हुए वचन सुनकर ब्राह्मणी भार आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे ! आपको ती हैं । कृपा करके मेरे पति के कोढ़ को दूर करो । ने लगी कि उन दिनों जो तुमने व्रत किया था उस व्रत दिन का पुण्य अपने पति का कोढ़ दूर होने के लिए करो मेरे प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से रहित और सोने के शरीर वाला हो जायेगा । ब्रह्मा जी बोले इस प्रकार देवी वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से ठीक है , ऐसे बोली । तब तक उसके बपति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया जिसकी कान्ति के सामने चन्द्रमा की कान्ति क्षीण हो जाती है । वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति पराक्रमी वाली समझकर स्तुति करने लगी कि हे दुर्गे ! आप दुर्गत को दूर करने वाली तीनों जगत् का सन्ताप हरने वाली , समस्त दुःखों को दूर करने वाली , रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली , प्रसन्न होने पर मनवांछित वस्तु को देने वाली और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो । तम ही सारे जगत् की माता और पिता हो । हे अम्बे ! मुझ अपराध रहित अबला की मेरे पिता ने कुष्ठा के साथ विवाह कर मुझे घर से निकाल दिया । उसकी निकाली हुई पृथ्वी पर घूमने लगी । आपने ही मेरा इस आपत्ति रूपी समुद्र से उद्धार किया है । हे देवी ! आपको प्रणाम करती हूँ । मुझ दीन की रक्षा करो । ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते ! इसी प्रकार उस सुमति ने पत्र से देवी की बहुत स्तुति की , उससे की हुई स्तुति सुनकर देवी को बहन सन्तोष हुआ और ब्राह्मणी से कहने लगी कि हे ब्राह्मणी ! तम्हारे उदालय नाम का एक अति बुद्धिमान , धनवान , कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीघ्र ही होगा । ऐसे कहकर वह देवी उस ब्राह्मणी से फिर कहने लगी कि हे ब्राह्मणी और जो कुछ तेरी इच्छा हो वही मनवांछित वस्तु माँग सकती है । ऐसा भगवती दुर्गा का वचन सुनकर सुमति बोली कि हे भगवती दुर्गे ! अगर आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्रि विधि बताइए । हे दयावती ! जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से आप प्रसन्न होती हैं उस विधि और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन करें । इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुनकर दर्गा कहने लगी कि हे ब्राह्मणी ! मैं तुम्हारे लिए सम्पूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र व्रत विधि को बतलाती हूँ जिसको सुनने से तमाम पापों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है । आश्विन मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधि पूर्वक व्रत करें । यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय का भोजन करें । पढ़े - लिखे ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापना करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचे । महाकाली , महालक्ष्मी और महासरस्वती मूर्तियाँ बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से विधि पूर्वक अर्घ्य दें । बिजौरा के फूल से _ _ अर्घ्य देने से रूप की प्राप्ति होती है । जायफल से कीर्ति , दाख से कार्य की सिद्धि होती है । आँवले से सुख और केले से भूषण की प्राप्ति होती है । इस प्रकार फलों से अर्ध्य देखकर यथा विधि हवन करें । खांड , घी , गेहूँ , शहद , जौ , तिल , बिम्ब , नारियल , व और कदम्ब , इनसे हवन करें । गेहूँ होम करने से लक्ष्मी कीप्र प्राप्ति होती है । खीर और सुख की प्राप्ति प्राप्त होता है । कम की प्राप्ति होती है । व इनसे तथा फलों काम खीर व चम्पा के पुष्पों से धन और पत्तों से तेज प्राप्ति होती है । आँवले से कीर्ति और केले से पुत्र कमल से राज सम्मान और दाखों से सुख सम्पत्ति होती है । खांड , घी , नारियल , शहद , जौं और तिल , फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति वित करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य सात नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के उसे दक्षिणा दें । इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के पार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं में तनिक भी संशय नहीं है । इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है , उसका करोड़ों गुना मिलता है । इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेघ यज्ञा का फल मिलता है । हे ब्राह्मणी ! इस सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ , मन्दिर अथवा घर में ही विधि के अनुसार करें । ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते ! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अन्तर्ध्यान हो गई । जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्ति पूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में दुलर्भ मोक्ष को प्राप्त होता है । हे बृहस्पते ! यह दुर्लभ व्रत का माहात्म्य मैंने तुम्हारे लिए बतलाया है । ऐसा ब्रह्मा जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी आनन्द के कारण रोमांचित हो गए और ब्रह्मा जी से कहने लगे - हे ब्रह्मा जी ! आपने मुझ पर अति कृपा की जो अमृत के समान इस नवरात्रि व्रत का माहात्म्य सुनाया । हे प्रभो ! आपके बिना और कौन इस माहात्म्य को सुना सकता है ? ऐसे बहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि हे बहस्पते ! तुमने सब प्राणियों का हित करने वाले इस अलौकिकप्र प्राप्ति होती है । खीर और सुख की प्राप्ति प्राप्त होता है । कम की प्राप्ति होती है । व इनसे तथा फलों काम खीर व चम्पा के पुष्पों से धन और पत्तों से तेज प्राप्ति होती है । आँवले से कीर्ति और केले से पुत्र कमल से राज सम्मान और दाखों से सुख सम्पत्ति होती है । खांड , घी , नारियल , शहद , जौं और तिल , फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति वित करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य सात नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के उसे दक्षिणा दें । इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के पार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं में तनिक भी संशय नहीं है । इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है , उसका करोड़ों गुना मिलता है । इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेघ यज्ञा का फल मिलता है । हे ब्राह्मणी ! इस सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ , मन्दिर अथवा घर में ही विधि के अनुसार करें । ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते ! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अन्तर्ध्यान हो गई । जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्ति पूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में दुलर्भ मोक्ष को प्राप्त होता है । हे बृहस्पते ! यह दुर्लभ व्रत का माहात्म्य मैंने तुम्हारे लिए बतलाया है । ऐसा ब्रह्मा जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी आनन्द के कारण रोमांचित हो गए और ब्रह्मा जी से कहने लगे - हे ब्रह्मा जी ! आपने मुझ पर अति कृपा की जो अमृत के समान इस नवरात्रि व्रत का माहात्म्य सुनाया । हे प्रभो ! आपके बिना और कौन इस माहात्म्य को सुना सकता है ? ऐसे बहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि हे बहस्पते ! तुमने सब प्राणियों का हित करने वाले इस अलौकिकव्रत को पूछा है इसलिए तुम धन्य हो । यह भगवती शक्ति सम्पूर्ण लोगों का पालन करने वाली है , इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है ।

                  ⍟☆⍣ जय माता दी ⍣☆⍟
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